लोगों की जान और जेब दोनों पर भारी पड़ा कोरोना।

लोगों की जान और जेब दोनों पर भारी पड़ा कोरोना।

कहीं लाशों का ढेर है, कहीं ऑक्सीजन की कमी से जूझती मरीज़ों की तस्वीर, किसी अस्पताल में बेड कम पड़ चुके हैं तो कही एम्बुलेंस में मरीज़ को घंटों रख इलाज करने को मजबूर हैं डॉक्टर्स।

लॉकडाउन की मार झेलती जनता अपना बोरिया बिस्तर उठाये स्टेशन की ओर निकल पड़ी है।भीड़ फिर से उमड़ रही है।कोई अपने गांव वापस जा रहा है तो किसी को अपनी भूख से जूझने का कोई रास्ता नहीं दिखता।यह भयावह दृश्य कहीं और का नहीं बल्कि अपने देश अपनी भूमि भारत का है।

कोरोना की दूसरी लहर ने इस बार भारत को हर तरफ से तोड़ दिया है।मार्च 2020 में कोरोना जब भारत में अपने पाँव पसार रहा था तब शायद यहां की सरकारों को इसके त्रिकाल रूप का बिलकुल अंदाज़ा नहीं था, पर फिर भी किसी तरह लोग एकजुट हुए और धीरे धीरे इस महामारी के दलदल से निकलने की कोशिश में जुटे रहे। हम कुछ हद तक संभले भी थे लेकिन कोरोना का कहर अभी बाकी था।

आज के समय की स्थिति देखकर लगता है की हम तो कभी इस महामारी से बाहर निकले ही नहीं। यह तो वह तूफान है जो थोड़ी देर के लिए थम गया था और फिर दुगनी रफ्तार से अपनी हवाओं से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। मौजूदा हालात ने हमारे सामने सिर्फ व्यवस्था की नाकामियां नहीं रखी बल्कि सवालों का भारी बक्सा रखा है। वो सभी लाशें सरकारों से यह पूछ रही हैं कि हम सिस्टम की लापरवाही का शिकार क्यों हुए? लेकिन शायद इसका जवाब हमें कभी न मिले।

लोगों की जान और जेब दोनों पर संकट मार्च 2020 की तुलना में अप्रैल 2021 में ज्यादा भयवाह नज़र आता है।जब कोरोना के लिए हम बिल्कुल भी तैयार नहीं थे तो इसके नुकसान हमारे लिए भारी पड़ रहे थे। पर प्रश्न यह है की महामारी के इतने दिनों बाद भी हम अभी तक इसके लिए कोई तैयारी नहीं कर पाए और पहले से बदत्तर हालातों से जूझ रहे हैं। इस संकट की स्थिति में जनता का ध्यान शायद उन मसलों पर न जाए जो उनकी परेशानियों का कारण है। पर कोरोना के शुरुआती दौर से अब तक जिन लापरवाहियों के कारण भारत की जनता यह मंज़र देख रही है उसमें सरकार और सरकारी व्यवस्था एक बहुत बड़े कारक है।

टीकाकरण से ज्यादा जरूरी थी चुनाव रैलियां..

महामारी के कहर से लड़ रहे देशों के लिए 2021 का साल एक उम्मीद ले कर आया। वो उम्मीद थी कोरोना की वैक्सीन। टीकाकरण वर्तमान समय की सबसे अहम जरूरत थी। दुनिया के तमाम देश अपने नागरिकों को सुरक्षित करने में लगे थे, लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता। हमें आदत है सबसे उलट काम करने की।

भारत में शायद टीकाकरण से भी ज्यादा जरूरी काम यहां की सरकार के पास थे और वो थे संसद का भव्य निर्माण( सेंट्रल विस्टा जीर्णोद्धार परियोजना), राम मंदिर का शिलान्यास, और बंगाल चुनाव। जिस वक्त में केंद्र और राज्य सरकारों को पूर्ण रूप से टीकाकरण के लिए नीतिगत ढांचा तैयार करना चाहिए था उस वक़्त में सिर्फ जनवरी के माह में वर्चुअल टीकाकरण कार्यक्रम का शुभारंभ करके सरकार निश्चिंत हो कर चुनाव की रणनीति तैयार करने में लग गयी।

आलम कुछ ऐसा हुआ की इस टीकाकरण अभियान का ढोल दो महीन भरपूर सुनाई दिया और फिर जैसे उसकी ओर विचार करना बंद कर दिया गया। नतीजा यह हुआ की जहां हम जनवरी फरवरी के माह में रिकवरी रेट के आंकड़े देख रहे थे अब वहीं एक दो महीने बाद एका एक मौत के आंकड़े देख रहे हैं।

यह आंकड़े सिर्फ इस बात पर प्रश्न नहीं उठाते की भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था क्या किसी की जान बचा सकती है बल्कि यह भी प्रश्न पूछती है कि आखिर कुछ ही दिनों में हालात इतने गंभीर कैसे हो गए?

इस सवाल से सम्बंधित कुछ और उत्तर आपको तब मिल जाते है जब महामारी की गाइडलाइन्स को ताक पर रख कर नेता राजनीति खेलने में लगे हुए थे। फिर चाहे वो बंगाल में प्रधानमंत्री मोदी का चुनाव प्रचार के लिए आना हो और लोगों की भीड़ देख कर खुश होना हो। या फिर आस्था को जान से ऊपर मान कर कुंभ में स्नान करना हो।

इन सब के बीच टीकाकरण प्रक्रिया में सरकार की लापरवाहियों का पिटारा एक बार खुलता है तो कई सारे भारी नुकसान हमारे सामने आते हैं। इन्हीं भारी नुकसान की श्रेणी में 10 करोड़ वैक्सीन की डोज़ में से 44 लाख बर्बाद होने की खबर भी आई थी। वर्तमान समय की स्थिति यह है की अब सरकारें अपने राज्यों में हो रही मौत के आंकड़े छुपाने में व्यस्त दिख रहे हैं। यह सभी बातें मन में एक प्रश्न को जन्म देती है की आखिर कोरोना के कारण पिछले एक वर्ष में जो नुकसान हम देख चुके थे क्या उससे लड़ने के लिए हमनें कोई विकल्प इतने वक़्त में भी तैयार नहीं किये?

आर्थिक नुकसान का नहीं कोई समाधान..

कोरोना के कारण सिर्फ लोगों की सेहत ही नहीं बल्कि आजीविका पर पर भी संकट आ चुका है। यह बिल्कुल उसी मुहावरे को चरितार्थ करता है की एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई। ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि लॉकडाउन के कारण लोग अपनी नौकरियां खो बैठे है और बाहर जा कर काम करने में वह अपनी जान खो सकते हैं।

ना जेब में पैसे हैं भूख मिटाने को न जान की सुरक्षा। इस दुर्दशा का अंदाज़ा शायद हमारी सरकार कोरोना से जूझते पिछले एक साल में नहीं लगा पायी। जिसका परिणाम है की आज भी संक्रमण रोकने के लिए इन्हें फिर से लॉकडाउन का सहारा लेना पड़ा। फिर से लोगों की जेब पर प्रहार किया गया। पिछले वर्ष इस महामारी से बचाव के लिए लॉकडाउन लगाया गया था, परिणाम किसी से छुपे नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था काफी बुरी तरह प्रभावित हुई। जीडीपी का नीचे गिरता स्तर और आर्थिक स्थिति का सम्पूर्ण आंकलन कई न्यूज़ चैनल ने अपनी रिपोर्ट में शामिल किया। उन्हीं आंकड़ों का इस्तेमाल कर आपको वर्तमान समय की स्थिति की दुर्दशा से अवगत कराते हैं।

एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक

आयोग (यूएनसीएपी) ने 30 मार्च 2021 को एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कोरोना महामारी पर लगाम लगाने के लिए टीकाकरण की शुरुआत के बावजूद भारत का सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) 2021 में 2019 के स्तर से नीचे रहने के आसार हैं।

महामारी का प्रकोप शुरू होने से पहले ही जीडीपी और निवेश धीमा पड़ चुका था। रिपोर्ट के अनुसार कोरोना को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए पूर्ण लॉकडाउन के कारण 2020 की दूसरी तिमाही (अप्रैल से जून) में आर्थिक बाधाएं अपने चरम पर थीं। लॉकडाउन में ढील दिए जाने के बाद अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटना शुरू हुई लेकिन सालाना आधार पर शून्य के क़रीब आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान के साथ चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था की गति हल्की पड़ गई।

रिपोर्ट के अनुसार 2021-22 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर के 7 फीसद रहने का अनुमान है जबकि इससे पहले के साल में यानी 2020-21 में कोरोना महामारी और उसके असर के कारण इसमें 7.7 फीसदी से अधिक के गिरावट होने का अनुमान है।

जनसत्ता की 6 सितम्बर 2020 की एक न्यूज़ रिपोर्ट ने भारत की डगमगाती अर्थव्यवस्था के हालात पर प्रकाश डालने का काम किया था। इस रिपोर्ट के अनुसार जीडीपी में जबरदस्त गिरावट से भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अर्थशास्त्री लगातार चिंता जता रहे हैं। पिछले दो सालों यानी 2019-20 से ही सरकार की ओर से परोसी जा रही झूठी कहानी का भंडाफोड़ केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) ने कर दिया।

सीएसओ की ओर से जारी 2020 की अप्रैल-जून की तिमाही (2020-21 की पहली तिमाही) के लिए जीडीपी का आकलन हमें एक गंभीर कहानी बताता है। इसके मुताबिक पहली तिमाही में जीडीपी में 23.9 फीसद की भारी गिरावट आई है। इसका मतलब यह हुआ की तीस जून, 2019 को जितना सकल घरेलू उत्पादन का लगभग एक चौथाई था। उतना पिछले बारह महीने के दौरान नष्ट कर दिया गया। यह ध्यान रखने की बात है की जब उत्पादन गंवा दिया जाता है, तो उसे हासिल करने वाली नौकरियां भी खत्म हो जाती हैं, उन नौकरियों में होने वाली आय खत्म हो जाती है और उन आमदनियों पर निर्भर परिवार संकट में पड़ जाते हैं।

अप्रैल-जून, 2020 की अवधि में 23.9 फीसद की गिरावट के साथ (जी-20 देशों में) भारत सबसे बदहाल अर्थव्यवस्था बन गया। अर्थव्यवस्था के बाकी सभी क्षेत्रों में बहुत तेजी से गिरावट आई। विनिर्माण 39.3 फीसद, निर्माण 50.3 फीसद और कारोबार, होटल, परिवहन और संचार क्षेत्र 47.0 फीसद तक गिर गया। अन्य देशों के मुकाबले भारत की स्थिति थोड़ी अलग है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था में गिरावट कोविड-19 का पहला मामला सामने आने के पहले ही शुरू हो चुकी थी। गिरावट का यह दौर दरअसल, नोटबंदी के साथ शुरू हो गया था। 2018-19 और 2019-20 के दौरान आठ लगातार तिमाहियों में, हर तिमाही में जीडीपी 8.2 फीसद के उच्च स्तर से गिरती हुई 3.2 फीसद के निचले स्तर पर जा पहुंची।

इस गिरावट की ओर न जाने कितनी बार इशारा किया गया, लेकिन सरकार इस बात का ढोंग रचती रही की भारत ‘दुनिया में सबसे तेज उभरती हुई अर्थव्यवस्था’ है। इसके अलावा मंत्रालयों द्वारा इन आंकड़ों को इक्कठा करने में आने वाले दिक्कत का कारण भी लॉकडाउन को बताया गया। 25 मार्च 2020 से देश में लॉकडाउन लगाया गया जिसके बाद कई आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गयी जिस कारण से आंकड़े इक्कठा करने वाले तंत्र भी ठप पड़ गए। एक बार फिर स्थितियां हमें उसी जगह ला कर खड़ा कर चुकी है जहां कोरोना की दूसरी लहर के साथ अब लॉकडाउन की भी दूसरी लहर फिर से अर्थव्यवस्था और आम जनता का गला घोंटने को तैयार है।

केंद्र बनाम राज्य…

वर्तमान समय में कोरोना से जनजीवन जितना प्रभावित हो रहा है। उसे कहीं ज्यादा राजनीतिक धांधलियों से जनता इस मौत के खेल का शिकार होती नजर आ रही है। इस राजनीति का सीधा नज़ारा आज के समय में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच की अनबन है। इस वक़्त की जरूरत जहां सभी सरकारों का एकजुट होकर भारत की जनता को इस संकट से निकालना होना चाहिए। उसके स्थान पर वो अपने ही फैलसों से लड़ने में व्यस्त है। केंद्र अपने नियमों और आदेशों को मनवाना चाहती है तो वहीं एक राज्य दूसरे राज्यों को समर्थन और साथ देने से अपने हाथ पीछे खींच रही है।

इस स्थिति की कुछ गंभीर तस्वीरे आपके सामने बीबीसी की 20 अप्रैल 2021 की एक न्यूज़ रिपोर्ट बेहतर ढंग से रख सकती है। इस खबर में दिल्ली हाइकोर्ट द्वारा राज्यों को ऑक्सीजन पहुँचाने, दवाइयों की उपलब्धता और सेवाओं में की जा रही लापरवाही को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाबदेही मांगी गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑक्सीजन की कमी और वैक्सीन की बर्बादी को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार दोनों को जमकर फटकार लगाई है। क़ानूनी मामलों को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती के अनुसार जस्टिस विपिन सांघवी और जस्टिस रेखा पल्ली की बेंच ने कोरोना पर हुई सुनवाई के दौरान कहा कि जिस तरह के हालात पैदा हो गए हैं उनमें अदालत इस मामले में रोज़ाना सुनवाई करेगी।

अदालत ने ऑक्सीजन की कमी के बारे में कहा कि आर्थिक हित इंसान की ज़िंदगी से बढ़कर नहीं हो सकते।
अदालत ने कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार को फ़ौरन ऑक्सीजन के इंडस्ट्रियल इस्तेमाल पर रोक लगानी चाहिए। स्टील और पेट्रोलियम मंत्रालय से ऑक्सीजन लेकर राज्यों को क्यों नहीं दी जा सकती। ऑक्सीजन की जरूरत अभी है तो पूर्ति अभी कीजिए, इसके लिए 22 तारीख का इंतज़ार क्यों?

दरअसल सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि कुछ उद्योगों को छोड़ कर बाक़ी के लिए ऑक्सीजन सप्लाई पर दो अप्रैल से ही रोक लगी हुई है और 22 अप्रैल से कुछ और उद्योगों के लिए ऑक्सीजन सप्लाई पर रोक लगा दी जाएगी। इस पर अदालत ने कहा कि 22 अप्रैल तक का इंतज़ार क्यों करना है। अदालत ने कहा कि उद्योग इंतज़ार कर सकते हैं, लेकिन मरीज नहीं। लोगों की जान खतरे में है।

दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने अदालत से कहा कि आईनॉक्स नाम की कंपनी ने अदालत के आदेश के बाद भी दिल्ली को ऑक्सीजन सप्लाई करना बंद कर दिया है और कंपनी ने दूसरे राज्यों को ऑक्सीजन भेज दिया है। राहुल मेहरा ने अदालत को बताया कि कंपनी का कहना है कि उत्तर प्रदेश से दिल्ली ऑक्सीजन भेजने में कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती थी, इसलिए कंपनी ने दिल्ली को ऑक्सीजन नहीं सप्लाई किया।
इस पर अदालत ने सख़्त रवैया अपनाते हुए कहा कि अगर दवाएं और संसाधनों को बिना सोचे समझे दूसरी जगहों पर भेजा जाता है तो लोगों के हाथ खून से सने होंगे। हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई के दिन आईनॉक्स के मालिक और एमडी को अदालत में हाजिर रहने के आदेश दिए। अदालत ने यूपी सरकार को भी अदालत में हाज़िर होने के आदेश दिए। प्रवासी मजदूरों के पलायन की एक बार फिर खबरों के बीच अदालत ने कहा कि पिछली बार केंद्र और दिल्ली सरकार ने प्रवासी मजदूरों के मुद्दे पर पूरी तरह नाकाम रही थी।

यह सिलसिला यहीं नहीं खत्म होता, हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा संचालित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री से बैठक में दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा दिल्ली की दुर्दशा पर प्रकाश डाला गया। इस बैठक में मुख्यमंत्री ने केंद्र से सीधे प्रश्न पूछे की ऑक्सीजन की कमी होने पर वह केंद्र में किससे सहायता मांगे क्योंकि जिन राज्यों से दिल्ली को ऑक्सीजन की सप्लाई होनी है उन स्थानों से ऑक्सीजन को दिल्ली तक पहुँचने ही नहीं दिया जा रहा। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री को वैक्सीन के दामों में अंतर के लिए भी प्रश्न दागे। मुख्यमंत्री ने यह सवाल सीधे रूप से किया कि एक कंपनी द्वारा वैक्सीन उपलब्ध कराए जाने की बात पर उसने केंद्र को 150 रुपये में वैक्सीन देने की बात कही और राज्यों को 400 रुपये में। कंपनी के इस रवैये पर मुख्यमंत्री ने केंद्र से यह अपील की है कि जब देश एक है , समस्या एक है तो फिर वैक्सीन भी एक दाम पर उपलब्ध कराई जाए तो बेहतर होगा।

वर्तमान परिस्थितियों के आंकलन से बस यही बात सामने आती है की समस्या पिछली बार के मुकाबले ज्यादा गंभीर है। और सरकारों को इसमें भी अपना हित सिद्ध करने के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा। वह किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही से सिर्फ बचने की कोशिश में लगी है। क्योंकि उनकी व्यवस्था की असली हालत अब सबके सामने है। न ही वह अस्पतालों का निर्माण करा पायी है, न ही प्रवासी मजदूरों और रोज़मर्रा की आमदनी से घर चलाने वालों के लिए कोई आर्थिक विकल्प का निर्माण कर पाई है। न उद्योपतियों द्वारा कोरोना से उपचार में दिये गए फंड्स के इस्तेमाल की सही जानकारी दे पाई है। और न आज की स्थिति में लोगों को बेहतर और त्वरित मेडिकल सुविधाएं और वैक्सीन उपलब्ध कराने के कोई इंतेज़ाम कर पाई है। वह व्यस्त है तो सिर्फ अपने वोट पाने के लिए भीड़ बढ़ाने में, मंदिर निर्माण के लिए चंदा इक्कठा करने में, हाल फिलहाल में राज्यों की मौत के आंकड़े छुपाने में।

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